- न्यायको दिनमा प्रेतात्माहरु उठेझैँ
र नपाएर विस्मृतिको लेथे नदी
रक्सीको गिलाँसमा हाम्फाल्छु
र बिर्सन्छु आफ्नो पूर्वकथालाई
दिनभरि
सुकेको बाँसझैँ
आफ्नो खोक्रोपनमाथि
उँघेर,
पछुताएर
दिनभरि
रोगी मलेवाझैँ
आफ्नो छाती आफ्नै चुच्चोले ठुंगेर,
घाउहरु कोट्ट्याएर
दिनभरि
सल्लाघारीझैँ एकलासमा
अव्यक्त वेदनाले सुँक्क-सुँक्क रोएर
दिनभरि
पाते च्याउझैँ
धरती र आकाशको विशालतादेखि टाढा
एउटा सानो ठाउँमा आफ्नो खुट्टा गाडेर,
एउटा सानो छाताले आफूलाई ढाकेर
साँझमा
जब नेपाल खुम्चिएर काठमाडौं
काठमाडौं डल्लिएर नयाँ सडक
र नयाँसडक-असङ्ख्य मानिसका पाउमुनि कुल्चिएर,
टुक्रिएर,
अखबार, चिया र पानको पसल बन्छ
किसिम-किसिमका पोशाकमा
ओहोर-दोहोर गर्छन् थरीथरीका हल्लाहरु
फुल पारेको कुखुराझैँ कराउँदै
हिंड्छन् अखबारहरु
र ठाउँ-ठाउँमा अन्भकार पेटीमा उक्लिन्छ
मोटरहरुको प्रकाशकदेखि तर्सेर
अनि असङ्ख्य मौरीको भुनभुन र डसाइदेखि आत्तिएर
म उठ्छु
न्यायको दिनमा प्रेतात्माहरु उठेझैँ
र नपाएर विस्मृतिको लेथे नदी
रक्सीको गिलाँसमा हाम्फाल्छु
र बिर्सन्छु आफ्नो पूर्वकथालाई
पूर्वजुनि र मृत्युलाई
यसरी नै सधैँ
चियाको किटलीबाट एउटा सूर्य उदाएँछ,
सधैँ रक्सीको रित्तो गिलाँसमा एउटा सूर्य अस्ताउँछ
घुमिरहेकै छ प बसेको पृथ्वी– पूर्ववत्
फगत म अपरिचित छु
वरिपरिका परिवर्तनहरुदैखि,
दृश्यहरुदेखि,
रमाइलो देखि,
प्रदर्शनीको घुम्ने मेचमाथि
करले बसेको अन्धो जस्तै।
(२०१८–रुपरेखा)
यस कविताको हिन्दी अनुवाद-
भर दिन
खुश्क बांस की तरह
खुद के खोखले वजूद पर
उँघकर,
पछताकर
भर दिन
बीमार चकोर की तरह
खुद के सीने पर खुद ही चोंच मार-मार कर,
जख्मों को उधेड़कर
भर दिन
देवदार के पेड़ की तरह
दर्द से निःशब्द सुबक-सुबक कर रोकर
भर दिन
कुकुरमुत्ते की तरह
धरती और आकाश की विशालता से दूर
एक छोटी-सी जगह पर अपना पैर धँसाकर
एक छोटी-सी छतरी से खुद को ढककर।
शाम को
जब नेपाल सिकुड़कर काठमांडू
काठमांडू सिकुड़कर नयाँ सडक
और नयाँ सडक सिकुड़कर-अनगिनत इंसानों के पैरों से कुचलकर,
टुकड़ों में बँटकर
अखबार, चाय और पान की दुकाने बनता है,
किस्म-किस्म के परिधानों में
आती जाती हैं किस्म-किस्म की अफवाहें
अंडा देती हुई मुर्गी की तरह चिल्लाकर
चलते हैं अखबार
और जगह-जगह पर फुटपाथ पर चढ़ जाता है अँधेरा
गाड़ियों की रोशनी से डरकर।
और अनगिनत मधुमक्खियों की भनभनाहट और डंक से हड़बड़ाकर
मैं उठता हूँ
जैसे कयामत के दिन प्रेतात्माएँ उठती हैं
और न पाकर भूल जाने की दरिया
शराब के प्याले पर कूद पड़ता हूँ
और भूल जाता हूँ अपनी अतीत की सारी कहानियाँ
पूर्वजन्म और मौत को।
इसी तरह हर रोज़
चाय की केतली से एक सूरज उग आता है
हर रोज़ शराब की खाली प्याली पर एक सूरज डूब जाता है !
घूम ही रही है पृथ्वी-पहले की ही तरह
सिर्फ मैं अनभिज्ञ हूँ
अगले-बगल के बदलाव से,
दृश्यों से
खुशियों से,
प्रदर्शनी पर राखी हुई घूमने वाली कुर्सी पर
बेमन से बैठे हुए एक अंधे की तरह।